रक्षाबंधन का त्यौहार हिंदुओं का प्रमुख त्यौहार है। प्रेम सौहार्द की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है यह पर्व। बाजारों की शोभा बढ़ जाती हैं। कलाईयों पर सजी राखियां, बहनों के हाथों में मिठाई के डब्बे इधर उधर आती जाती सड़कों पर बहनों की चहल पहल, इस त्योहार की रौनक को बढ़ाती हैं। इस पर्व को राखी का पर्व भी कहते हैं।
रक्षा बंधन का त्यौहार सावन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता हैं। भद्रा नक्षत्र में राखी नही बांधनी चाहिए।
राखी बांधने के समय मंत्र उच्चारण का विशेष महत्व होता हैं। यह मंत्र इस प्रकार हैं
येन बद्धो बलि राजा,दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।
इसका अर्थ हैं जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा।
रक्षाबंधन पर्व का इतिहास बहुत पुराना है। देवी देवताओं से लेकर , मुगल काल तक के इतिहास में रक्षाबंधन त्यौहार की झलक मिलती हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार सबसे पहले राखी पर्व की शुरुआत पति पत्नी से हुई थी। इंद्र देव व्रत्तासुर से युद्ध के लिए जा रहे थे तब इंद्र देव की पत्नी रानी शचि ने उनकी कलाई पर मौली बाध कर रक्षा सूत्र बाधा और राखी पर्व की नींव रखी। रानी के रक्षा सूत्र बाधने से इंद्र देव ने व्रत्तासुर का वध किया और स्वर्ग का राजसिंहासन बचाया।
राजा बली बहुत ही दानी राजा थे और प्रभु विष्णु के अनन्य भक्त थे। एक बार राजा बली ने यज्ञ का आयोजन किया था । प्रभु विष्णु उनकी दान धर्म की परीक्षा लेने के लिए वामन अवतार धारण कर धरती पर प्रकट हुए। विष्णु भगवान ने राजा बली से तीन पग भूमि मांगी। राजा बली ने कहा आप भूमि माप ले , लेकिन वामन रूप में तो स्वयं नारायण थे और उन्होंने एक पग में धरती माप ली, और दूसरे पग में आकाश माप लिया। अब राजा बली के पास तीसरे पग के लिए कुछ न बचा , फिर राजा बली वामन रूपी विष्णु भगवान से बोले आप तीसरा पग मेरे सर पर रख दे, और तीसरे पग में विष्णु भगवान ने अपना पैर बली के सर पर रख दिया इस तरह विष्णु भगवान का दान पूर्ण हुआ।
अब राजा बली का सब कुछ दान में चला गया तो वह प्रभु से विनती करे की आप मेरे साथ चल बैकुंठ धाम में रहिए भगवान अपने भक्त को बात टाल ना सके और बली के साथ बैकुंठ धाम रहने चले गए। इधर प्रभु का न पाकर माता लक्ष्मी अति व्याकुल हो गई और भगवान को वापस लाने के लिए एक गरीब महिला का रूप लेकर राजा बली के पास पहुंची। राजा बली के हाथ पर माता लक्ष्मी ने मौली बाधी और भाई बना भेंट में अपने पति परमेश्वर को वापस मांगा। ऐसे में बली बहन को बात को टाल ना सके और विष्णु भगवान को जाने दीया। इस तरह राखी पर्व से मां लक्ष्मी नारायण भगवान को पाताल लोग से वापस लाई।
यही कारण है की प्रभु ४ महीने पाताल लोक में चले जाते है और देवोत्थान एकादशी के साथ ही पुनः बैकुंठ धाम आते हैं।
महाभारत में राखी पर्व का बहुत ही सुन्दर उल्लेख मिलता है। राखी पर्व के लिए खून के बंधन का होना जरूरी ना हैं। भाई बहन का रिश्ता प्रेम और स्नेह का होता हैं।
एक बार राजा युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ कर रहे थें उसी समय यज्ञ में विघ्न डालने के लिए शिशुपाल भी मौजूद था। भरी सभा में शिशुपाल ने भगवान कृष्ण को गाली देना प्रारंभ कर दिया पर कृष्ण भगवान ने स्वयं पर सय्म रखा और कुछ ना कहा, परंतु जैसे ही शिशुपाल ने सौ से अधिक गाली दी कृष्ण ने शिशुपाल का गला अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया। जब सुदर्शन चक्र लौट के आया भगवान कृष्ण की कानी उंगली पर कट गई और रक्त बहने लगा ,उसी समय द्रोपदी ने भगवान कृष्ण को अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर रखी बांधी , और भाई बहन के प्रेम और विश्वास की अनूठी मिसाल दी।
बदले में भगवान कृष्ण ने अपनी बहन द्रोपदी को साड़ी बड़ा कर बहन की इज्जत बचाई थी। वह दिन पुर्णिमा का ही था। तब से सावन मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को राखी पर्व मनाया जाता हैं।
महाभारत में जब कौरव पाण्डव के बीच में युद्ध की घोषणा हुई तब राजा युधिष्ठिर ने अपने सभी सैनिकों के प्राणों को रक्षा के लिए सभी के हाथों में राखी बाधी थी।
रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी बांधी थीं। जब गुजरात के शासक बहादुर शाह ज़फ़र ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया था ऐसे समय में रानी कर्णावती ने हुमायू को रक्षा के लिए संदेश भिजवाया था पर कुछ कारण वश हुमायू लेट हो हुए और रानी की जौहर कर लिया पर राखी के लाज रखने हुमायू आया जरूर था ।
राखी पर्व का मनाने के पीछे का प्रमुख उद्देश्य भाई बहन के प्रेम और त्याग को बहुत ही सुंदर रूप में प्रस्तुत करना हैं। रिश्ता खून का हो या भावनाओं का राखी का पर्व उन्हें आपस में जोड़ता हैं। वीर जवानों को राखी बांध कर उनके लंबे उम्र की कामना करते हैं। राखी का प्रमुख उद्देश्य रक्षा सूत्र से हैं। हम जिसकी भी रक्षा की कामना करते हैं उनके हाथ की कलाई पर प्यार का ये धागा बांधा जाता हैं।
राखी का पर्व सावन मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता हैं।