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Karwachauth Special Saree: टॉप 10 ट्रेडिशनल साड़ी जिनके आगे लंहगे भी हैं फेल

सीजन त्यौहारों का हो या शादियों का महिलाओं की यह समस्या बढ़ जाती  हैं। शादी सीजन में ज्यादातर महिलाएं लंहगे को तवज्जो देती थीं। इसके बाद होड़ में आ गए क्रॉपटॉप स्कर्टस, अनारकली, डिजाइनर गाउन , इंडो वेस्टर्न सूट्स जिन्होंने फैशन जगत को नई दिशा दी। 

इतने सारे ऑप्शंस होने के बाद भी जब बात शादी समारोह, पूजन, व्रत , त्यौहार की आती है तो साड़ी आज भी लोगों की पहली पसंद हैं। साड़ी कभी आउट ऑफ फैशन नहीं होती है। हर वर्ग , हर जाति धर्म की महिलाएं, अभिनेत्री हो या आम इंसान साड़ी सभी की पहुंच में है। 

टॉप टेन ट्रेडिशनल साड़ियां ( Top Ten Traditional Saree's) 

साड़ी को पुराने जमाने से ही सबसे श्रेष्ठ पहनावा बताया गया हैं। ऐसे में हम आपके लिए कुछ ऐसी खास साड़ियां लाए है जिनका फैशन कल भी था, आज के दौर में भी है और आने वाले समय में भी रहेगा यह है वो खास साड़ियां : 

  • बनारसी साड़ी
  • सिल्क साड़ी
  • पाटन पटोला साड़ी 
  • कांचीवरम साड़ी
  • गड़वाल साड़ी
  • जामदानी साड़ी
  • पैठणी साड़ी
  • घरचोला साड़ी
  • चंदेरी साड़ी
  • पोचमपल्ली इक्कतो साड़ी

बनारसी साड़ी (Banarasi saree) 

बनारसी साड़ी का इतिहास बहुत पुराना है। इसकी शुरुआत बनारस शहर से हुई हैं। उत्तरप्रदेश के आजमगढ़, मिर्जापुर , चंदौली, बनारस,  जौनपुर और संत रविदास नगर में बनारसी साड़ी बनाई जाती है। इसे तैयार करने में 6 महीने से लेकर तीन साल तक का समय लग जाता हैं।

अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ कहा जाने वाला बनारसी साड़ी का काम अब चिंताजनक स्थिति में हैं। शिल्प जगत , हाथों से बुनाई वाले कामों में पहले से गिरावट आई है परंतु माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने यह विश्वास दिलाया हैं की वह इस हेतु जरूर प्रयास करेंगे। 

सिल्क साड़ी  

रेशम के धागों से बनाई जाने वाली यह साड़ी सबसे मंहगी साड़ियों में से एक हैं। यह देखने और पहनने में जितनी नाजुक होती हैं उतनी ही रखरखाव की जरूरत भी होती हैं। 

सिल्क साड़ियां कई प्रकार की होती हैं। त्यौहारों के सीजन में इन साड़ियों की खासी डिमांड होती हैं, इन्हे खरीदने से पहले अपने चेहरे के रंग का अवश्य ध्यान रखे , क्युकी यह साड़ियां देखने में बहुत चमकदार और भड़काऊ होती हैं। 

पाटन पटोला 

पाटन पटोला साड़ी गुजरात की रेशमी साड़ी हैं। जिसे बुनाई से पहले निर्धारित स्थानों पर गांठ बांधकर रंग दिया जाता हैं। पाटन पटोला साड़ी की बुनाई में प्रयोग किया जाने वाला धागा कर्नाटक या पश्चिमी बंगाल से आता हैं। यह धागा बेहद खास और नाजुक होता हैं। 

पाटन पटोला साड़ी की यह खासियत होती है की इसे दोनों ओर से पहना जा सकता हैं। इसमें सीधे उलटे की कोई पहचान नही होती हैं। इस साड़ी की यह विशेष खूबी है की 100 साल तक भी इसका रंग , इसकी चमक फीकी नहीं पड़ती हैं। 

कांचीवरम साड़ी  

कांचीवरम साड़ी का संबंध दक्षिण भारत से हैं। यह शहरी भारतीय महिलाओं की पहली पसंद मानी जाती हैं।  कांचीवरम साड़ी का सिल्क सबसे शानदार क्वाल्टी का होता हैं। कांचीवरम दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य के कांचीपुरम शहर में बनाई जाती हैं। इस साड़ी की बुनाई में सोने चांदी के का इस्तेमाल किया जाता हैं।  

गड़वाल साड़ी 

गड़वाली साड़ी भारत के एक मशहूर राज्य तेलंगाना से संबंधित हैं। गड़वाल साड़ी जोगुलंबा गडवाल जिले में बुनी जानी वाली हस्तस्लिप कला का बेहतरीन उदाहरण हैं। ये साड़ियां जरी के लिए बेहद उल्लेखनीय हैं। इन साड़ियों में जरी के काम का पल्लू होता हैं इनका अन्य नाम सिको भी हैं। 

यह साड़ियां देखने में बेहद खूबसूरत होती हैं। वही वजन में इतनी हल्की होती है की एक माचिस की डिब्बी में आ जाए।  

जामदानी साड़ी 

जामदानी साड़ी की विशेष बात यह है की , ये किसी साड़ी का नाम नहीं है अपितु साड़ी पर होने वाली कारीगरी का नाम हैं । इस प्रकार की साड़ी में कारीगरी को हॉरिजॉन्टल तरीके से किया जाता हैं। इस पैटर्न में एक बार बुनाई होने पर उसी ओर दुबारा बुनाई की जाती है जिससे बुनाई एक दम पक्की हो जाए। 

पैठणी साड़ी 

महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के छोटे से नगर में बनी यह साड़ी आज देश भर में प्रचलित हैं। पैठणी साड़ी का इतिहास बहुत पुराना हैं। पैठणी साड़ी की उत्पत्ति सातवाहन वंश के समय से मानी जाती हैं। इस साड़ी को बनाने में खास चीन से रेशम के धागे मगाये जाते हैं। 

इस साड़ी को बनाने में बहुत अधिक खर्च के साथ सावधानी बरतने की भी जरूरत हैं। बीच में इस साड़ी की बुनाई पर रोक लग गया था परंतु पेशवा शासन में इस साड़ी की बुनाई पुनः प्रारंभ होने लगीं। 

घरचोला साड़ी 

इन साड़ियों को घाटचोला साड़ी भी कहते हैं। घाटचोला साड़ी की उत्पत्ति गुजरात से हुई हैं। गुजरात की प्रसिद्ध घाटचोला साड़ी या सूती या रेशम की बुनाई से बनी होती हैं। इन साड़ियों को यह खूबी होती है की बड़े चेक के पैटर्न पर जरी का काम होता हैं। इसके बाद इन साड़ियों पर राजस्थानी रंग चढ़ाया जाता हैं। तब कही जाकर एक सुंदर साड़ी तैयार होती हैं।  

चंदेरी साड़ी 

चंदेरी साड़ी शुद्ध रेशम या चंदेरी कपास से बनती हैं। इनका इतिहास बहुत पुराना हैं करीब 1890 से इन साड़ियों का चलन शुरू हुआ था। यह साड़ी 800 रुपए से लेकर 7लाख रुपए तक आती हैं। जितना बारीक रेशम का काम उतनी कीमती साड़ी। 

पोचमपल्ली इक्कतो साड़ी 

पोचमपल्ली इक्कतो साड़ी तेलंगाना राज्य के भुवनगिरी जिले में बनाई जाती हैं। इस साड़ी के नाम में इकत एक पैटर्न होता है जिसके आधार पर इन साड़ियों की बुनाई की जाती हैं। यह एक पारंपरिक ज्यामितीय पैटर्न होता हैं। 

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