गणेश चतुर्थी भगवान गणेश का महापर्व हैं। हरितालिका तीज के अगले दिन गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता हैं। यह पर्व महाराष्ट्र में सबसे अधिक प्रचलित हैं।
गणेश चतुर्थी दस दिन का उत्सव होता हैं। जिसे बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता हैं। ऐसा माना जाता है को महर्षि वेद व्यास जी ने महाभारत की रचना हेतु गणेश भगवान जी का मंत्र जप शुरू किया इसके पश्चात गणेश जी पधारे। यह दिन चतुर्थी का था। भगवान गणेश ने प्रकट होकर महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना मात्र दस दिन में कर दी। इन्ही दिनों को उत्सव के रूप में मनाते हैं।
यह कथा भगवान गणेश और चंद्र देव के मध्य की हैं। एक बार भगवान गणेश को चंद्रलोक से भोजन का आमंत्रण आया। भगवान गणेश ने आमंत्रण स्वीकार करते हुए चंद्रलोक की ओर प्रस्थान किया। भोजन में मोदक भी थे जिसे देख भगवान गणेश बहुत प्रसन्न हुए।
भगवान ने पहले खूब सारे मोदक खाए फिर साथ में बाध के घर लाने लगे इसी हड़बड़ी में गणेश भगवान जी से कुछ मोदक नीचे गिर गए जिस पर चंद्र देव हस दिए यह देख गणेश जी क्रोधित हो गए और गुस्से में चंद्र देव को श्राप दे दिया की आज के बाद जो भी तुम्हे चौथ के दिन देखेगा उसके साथ अपशकुन होगा।
यह दिन चौथ का ही था। चंद्र देव तुरंत ही भगवान गणेश से अपनी गलतियों की माफी मांगने लगे पर देर हो जाने के कारण भगवान ने श्राप वापस नहीं लिया जिस कारण से आज तक गणेश चतुर्थी का चांद देखना कलंकित माना जाता हैं।
इस चांद को देखने से व्यक्ति पर चोरी जैसे महापाप का इल्ज़ाम लगता हैं। इस चांद को देख लेने के बाद स्वयं भगवान कृष्ण भी खुद को कलंक से न बचा पाए।
इस चौथ के चांद को देखने के कारण स्वयं भगवान कृष्ण भी खुद को न बचा पाए। इसके उपाय स्वरूप भगवान कृष्ण ने गणेश भगवान का पूजन किया और गणेश चतुर्थी का व्रत किया।
यदि कोई व्यक्ति जाने अंजाने में यह चांद देख ले तो उसे स्यमन्तक मणि की कथा सुननी चाहिए और पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान गणेश का पूजन करना चाहिए।
सबसे पहले आप गणेश भगवान के मंत्र का जाप करे। इसके पश्चात गणेश चतुर्थी के दिन स्नान करके भगवान गणेश को मोदक और दुर्बा चढ़ाएं सच्चे मन से भगवान गणेश का पूजन आरती कर गणेश चतुर्थी का व्रत करे और स्यमन्तक मणि की कथा सुने।
भगवान कृष्ण मथुरा छोड़ कर द्वारकापुरी आकर रहने लगे थे। द्वारका में रहने वाले एक व्यक्ति सत्राजित यादव रहते थे। जो भगवान सूर्य के बहुत बड़े भक्त थे। भगवान सूर्य देव ने उन्हे आशीर्वाद रूप में आठ भार सोने की मणि दी थी।
जब इस विषय के बारे में भगवान कृष्ण को पता चला उन्हे यह मणि देखने की इच्छा हुई लेकिन यह मणि सत्राजित ने अपने भाई प्रसेनजीत को दे दी। तभी प्रसेनजीत को एक शेर ने मार दिया और मणि शेर को मिल गई।
इसके पश्चात रीछों के राजा जामवंत ने शेर को मार के वह मणि अपने पास रख ली उधर प्रसेनजीत के न मिलने पर उसकी खोज शुरू हो गई श्री कृष्ण भगवान स्वयं उसे खोजने निकले खोजते हुए वह जामवंत की गुफा में पहुंच गए। वहा जामवंत की बेटी जामवती us मणि को लेकर खेल रही थी जिसे कृष्ण भगवान ने देख लिया मांगने पर जामवंत क्रोधित हो गया और भगवान कृष्ण से युद्ध करने लगा यह युद्ध पूरे २१ दिन चला जिसके बाद जामवंत यह समझ गया की , यह कोई मामूली व्यक्ति नहीं हैं अपितु यह भगवान का अवतार हैं और वह प्रभु के चरणों में गिर कर माफी मांगने लगा । इसके बाद जामवंत से यह मणि भगवान कृष्ण को दे दी साथ ही अपनी बेटी जामवती का विवाह भगवान कृष्ण से कर दिया।
भगवान कृष्ण यह मणि लेकर सत्राजित के पास लौटे और पूरी कथा सुनाई। इस प्रकार भगवान कृष्ण पर मणि चोरी का आरोप लगा। जो इन्हे चौथ का चांद देखने के कारण पड़ा।