मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं। उसे समाज में रहना लोगों से मिलना बेहद पसंद हैं। ऐसे में अगर मनुष्य एक दम से एकांकी जीवन जीने लगे या वो अकेला रहना शुरू कर दें तो यह किसी बड़ी बीमारी का संकेत हैं।
हालाकि हर बार अकेलेपन से बीमारी को जोड़ना उचित नहीं हैं। क्योंकि कई बार व्यक्ति गहरी सोच, किसी आत्मचिंतन या कार्य विशेष हेतु भी अकेले रहना पसंद करता हैं।
अकेलेपन से यहां तात्पर्य है व्यक्ति खुद को दुख अवसाद की स्थिति में पहुंचाकर सबसे दूर हो जाए। न की खुशी की स्थिति में या नॉर्मल स्थिति में अकेले रहना।
वयक्ति के जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं। इसलिए उसे कभी भी निराशा का दामन नहीं थामना चाहिएं। हर हाल में हर परिस्थिति में सकारतमक सोच के साथ ही आगे बढ़ना चाहिए।